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​सस्ते सोलर के नाम पर बड़ा खेल: 2.20 लाख का सिस्टम 1.60 लाख में लगाने का दावा करने वाली कंपनियों की कड़वी सच्चाई!

 ​बिजली बिल जीरो करने की चाह में आज हर दूसरा मकान मालिक अपनी छत पर सोलर प्लांट लगवाना चाहता है। लेकिन मांग बढ़ते ही बाज़ार में ऐसी बरसाती मेंढक जैसी सोलर कंपनियों की बाढ़ आ गई है, जिनका मकसद ग्राहक को सही सिस्टम देना नहीं, बल्कि सिर्फ 'सस्ते दाम' का लालच देकर फंसाना है।

​जहाँ एक मानक, मजबूत और ब्रांडेड 3kW या 5kW ऑन-ग्रिड सोलर प्लांट की वास्तविक लागत तय इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार आती है, वहीं कुछ कंपनियाँ ग्राहकों को खींचने के लिए 30% से 40% सस्ते रेट का बोर्ड लगा देती हैं।

​कान्हा इलेक्ट्रिकल पर रोज़ाना ऐसे परेशान ग्राहक आते हैं जो सस्ते के फेर में फंसकर अपनी छत और जमा-पूंजी दोनों का नुकसान कर चुके हैं। आइए जानते हैं कि इस "सस्ते सोलर" के पीछे असल में क्या काटा जाता है:

​1. स्ट्रक्चर में भयानक कटौती (हल्का जीआई पाइप)


​सोलर पैनल को कम से कम 25 साल तक आंधी, तूफान और भारी बारिश झेलनी होती है।

​मानक नियम के अनुसार भारी हॉट-डिप गैल्वेनाइज्ड (Hot-dip Galvanized) स्ट्रक्चर लगना चाहिए।

​सस्ती कंपनियाँ 20-30 हज़ार रुपये बचाने के लिए बेहद हल्का, पतला और लोकल पाइप लगा देती हैं। पहली तेज़ आंधी में 1.5 लाख के पैनल उड़कर ज़मीन पर आ गिरते हैं।

​2. बी-ग्रेड और बिना वारंटी वाली सोलर प्लेट्स

​ग्राहक को सिर्फ 'मोनो पर्क' या 'हाफ-कट' का नाम बता दिया जाता है, लेकिन पैनल अक्सर 'B-Grade' या 'री-पैक्ड' होते हैं।

​ये पैनल शुरुआत के 6 महीने तो ठीक बिजली बनाते हैं, फिर इनकी क्षमता 30-40% तक गिर जाती है। जब ग्राहक कंपनी को फोन लगाता है, तो कंपनी का नंबर बंद मिलता है।

​3. सस्ता और बिना अर्थिंग वाला इन्वर्टर

​सोलर सिस्टम का दिल उसका इन्वर्टर होता है। घटिया लोकल इन्वर्टर न तो ग्रिड के वोल्टेज संभाल पाते हैं और न ही पूरी धूप को बिजली में बदल पाते हैं।

​पैसे बचाने के चक्कर में प्रॉपर केमिकल अर्थिंग और लाइटनिंग अरेस्टर (आकाशीय बिजली से बचाव) छोड़ दिया जाता है, जिससे पूरे घर के उपकरण जलने का जोखिम बना रहता है।

​4. सब्सिडी और लोन की फाइल का झोल

​ग्राहक को सपना दिखाया जाता है कि "आप बस साइन कर दो, बाकी सब्सिडी और लोन हम अपने स्तर पर करवा देंगे।"

​फाइल सरकारी पोर्टल पर अधूरी छोड़ दी जाती है, कागज़ी कमियों की वजह से बैंक लोन या सब्सिडी अटक जाती है, और ग्राहक बैंक की ईएमआई (EMI) और बिजली विभाग के चक्कर काटता रह जाता है।

​कान्हा इलेक्ट्रिकल की खरी सलाह: सोलर रोज़-रोज़ नहीं लगता!

​सोलर सिस्टम मोबाइल फोन नहीं है जिसे आप हर दो साल में बदल लेंगे। यह आपके घर की छत पर 25 साल के लिए लगने वाला एक पावर प्लांट है।

​सिर्फ कोटेशन का रेट न देखें: दो कंपनियों के रेट में अगर 30-40 हज़ार का अंतर है, तो पूछिए कि स्ट्रक्चर की मोटाई (गेज) क्या है, डीसी वायर कौन सी कंपनी की है, और इन्वर्टर किस ब्रांड का है।

​लोकल और ज़िम्मेदार वेंडर चुनें: किसी बाहर की अनजान कॉल-सेंटर वाली कंपनी के बजाय अपने शहर के रजिस्टर्ड और तकनीकी रूप से सक्षम डीलर से काम करवाएं, जिसका दफ्तर आपके सामने हो और जो कल सर्विस देने के लिए मौजूद रहे।

​"सोलर में 30 हज़ार की बचत, 25 साल का सिरदर्द बन सकती है। सही उपकरण चुनें और पूरी गारंटी के साथ काम करवाएं।"

​(कान्हा इलेक्ट्रिकल, रसूलिया, नर्मदापुरम - सोलर और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर की पारदर्शी और तकनीकी सलाह के लिए आपका भरोसेमंद केंद्र)

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