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ब्रिक्स (BRICS) देशों की बैठक: क्या भारत में सोलर और ग्रीन एनर्जी के दाम होंगे सस्ते? जानिए कान्हा इलेक्ट्रिकल का ज़मीनी विश्लेषण
दुनिया के सबसे तेज़ी से उभरते शक्तिशाली देशों का समूह—ब्रिक्स (BRICS)—जब एक मेज पर बैठता है, तो आम तौर पर मीडिया का ध्यान कूटनीति, रक्षा और आपसी व्यापार पर टिक जाता है।
लेकिन 12-13 सितंबर के इस सम्मेलन में जब भारत और रूस जैसे देशों ने डॉलर पर निर्भरता घटाकर स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रूबल) में व्यापार का ऐतिहासिक रुख साफ किया, तो एक इलेक्ट्रिकल और सोलर प्रोफेशनल के नजरिए से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है: क्या दुनिया के इन बड़े देशों की आपसी साझेदारी से हमारी छत पर लगने वाले सोलर प्लांट, इन्वर्टर और बैटरियों के दाम कम होंगे? क्या बिजली के महंगे बिलों से राहत मिलेगी?
कान्हा इलेक्ट्रिकल (रसूलिया, नर्मदापुरम) पर आइए इसे बहुत ही आसान और ज़मीनी भाषा में समझते हैं।
1. डॉलर की निर्भरता घटी, तो सीधे घटेगी सोलर की लागत
अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोलर इक्विपमेंट्स, सिलिकॉन वेफर्स और इनवर्टर चिप्स खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहना पड़ता था। जब भी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता था, भारत में सोलर प्लेटों के दाम अचानक बढ़ जाते थे। स्थानीय मुद्राओं में सीधी खरीद होने से विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव का अतिरिक्त वित्तीय बोझ खत्म होगा, जिसका सीधा 10% से 12% तक का फायदा ज़मीनी स्तर पर प्लांट लगाने वाले उपभोक्ता को मिल सकता है।
2. सोलर सप्लाई चेन और ब्रिक्स देशों की ताकत
कच्चा माल और विनिर्माण: सोलर पैनल्स में लगने वाले सिलिकॉन वेफर्स, सेल्स और लिथियम-आयन बैटरियों के कच्चे माल का 70% से अधिक नियंत्रण ब्रिक्स और उसके सहयोगी देशों के पास है।
घरेलू मांग: भारत में पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के तहत करोड़ों घरों की छतों पर सोलर लगाने का महा-अभियान चल रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ने से भारत में उच्च गुणवत्ता वाले बाइफेशियल (Bifacial) पैनल्स की लागत में भारी गिरावट आ सकती है।
3. लिथियम बैटरी और स्टोरेज: भविष्य की सबसे बड़ी क्रांति
सोलर ऊर्जा के साथ रात के बैकअप के लिए आधुनिक लिथियम-आयन (LFP) बैटरियों की जरूरत होती है। ब्रिक्स देशों के बीच मिनरल्स और सप्लाई चेन के नए समझौतों से बैटरी स्टोरेज की लागत तेजी से नीचे आने की पूरी उम्मीद है। आने वाले 2 से 3 सालों में सोलर के साथ दिन-रात चलने वाला बैटरी बैकअप रखना बेहद किफायती हो जाएगा।
4. भारत का रुख: 'ग्लोबल सोलर हब' बनने की तैयारी
भारत का लक्ष्य अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है, ताकि नर्मदापुरम जैसे ज़िलों तक जो भी सोलर पैनल पहुंचे, वह अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता (Tier-1 Standard) का हो। जब तकनीक सस्ती होगी, तो उपभोक्ता का पेबैक पीरियड (लागत वसूली का समय) घटकर मात्र 3 से 3.5 साल रह जाएगा।
कान्हा इलेक्ट्रिकल का निष्कर्ष:
"ग्लोबल समिट्स के फैसले सिर्फ कागजों पर नहीं रहते, उनका असर सीधे आपके घर के बिजली मीटर और छत पर चमकती धूप के इस्तेमाल पर पड़ता है। ब्रिक्स का यह ऊर्जा-मंथन भारत के हर घर को सस्ती सौर ऊर्जा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।"
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